जिन्दगी के सफर का सच .......
इक राह जिन्दगी होती है , हम राही बनकर चलते हैं॥ ........ कब सोते हैं कब जगते है इस बात से फर्क नहीं परता , हर वक़्त मुसाफिर रहते हैं .......हम युही पार नही करते कभी बीच राह भटकते है , कभी ठोकर खाकर गिरते है ,फिर उठते हैं ,संभलते है ,एक लम्बी आहे भरते...
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मनीष झा
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[26 Jan 2009 06:41 AM]



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