तो क्या बांध न टूट जाएगा
कई दिनों से मैंने तुम्हें फोन नहीं किया बात नहीं की कुछ घबराई हूं डर जाती हूं भरे गले से कैसे बात करुंगी कैसे दे पाऊंगी हिसाब ठोकरों का जानती हूं बहुत सहनशील हो धरा की तरह लेकिन मैंने देखा है तुमको आंसुओं के साथ मेरी चोटों पर मरहम लगाते हुए तो कैसे...
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Sonalika
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[10 May 2009 03:01 AM]



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