बिजली बैरन भई

विवेक के व्यंग बिजली बैरन भई ज्यादा नहीं कोई पचास सौ बरस पुरानी बात है, तब आज की तरह घर-घर बिजली नहीं थी, कितना आनंद था। उन दिनों डिनर नहीं होता था, ब्यारी होती थी। शाम होते ही लोग घरों में लौट आते थे। संध्या पूजन वगैरह करते थे, खाना खाते थे। गांव - चौपाल में लोक ग... [पूरी पोस्ट]
writer Vivek Ranjan Shrivastava

बिजली

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[07 Aug 2008 23:07 PM]

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