पुकार

कर्मवीर रे मानव ! उठ जाग निद्रा से देख कराह रही ये धरा तेरी पुकार रही ये माँ तेरी उठ जा अब तो ओ मेरे लाल-नंदन घायल करते लूटते इसका यौवन चुन रहे पत्थरों में इसके सुंदर, विशाल और कोमल तन उसके हरियाले वसन का करते चीर-हरण कुछ दुःशासन -दुर्योधन जो करते नाश इस धरन... [पूरी पोस्ट]
writer अर्चना तिवारी
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[20 Jun 2009 13:06 PM]

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