पर्यावरण-
कराह रही है धरती अपनी तड़प रहा है जन - जीवन लुट गई हरियाली जिसकी काट दिए वन - उपवन छीन लिए जिसके सुन्दर आवरण खतरे में पड़ गया उसका पर्यावरण छाती थी घटाओं की परत तब तार - तार हुए ओज़ोन परत अब बनते थे जिसपे हरित गृह बन गई वह स्वयं हरित का गृह पिघल रहे है...
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अर्चना तिवारी
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[21 Jun 2009 13:28 PM]



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