कँही देर ना हो जाए

कल हो ना हो जेठ कब का बीता चूका ,आसाढ़ के इन दिनों में जबकी आसमान में घन घन मेघा होना चाहिए था और मोटी मोटी धार बरसानी चाहिए थी ,आसमान आग के गोले बरसा रहा है .धुप की तीखी मार ऐसी है की छाया भी छाया खोजती फिर रही है . कंक्रीट के जंगल बन गए हमारे शहरो में छाया रह... [पूरी पोस्ट]
writer mrityunjay kumar rai
views
8
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[24 Jun 2009 13:51 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix