शाम ही ढल गई

Shreekant Parashar इसकी टोपी उसके सिर, उसकी इसके सिर, ऐसे ही तो करते उनकी, जिंदगी निकल गई। दिन-रात दोस्तों को बेवकूफ बनाते रहे, लक्ष्मी तो आई मगर, नीयत फिसल गई। ऐसे लोगों का भला, आप क्या कीजिएगा, बुध्दि भी आई तो, साइड से निकल गई। दिनभर समझाते रहे, मित्र दिन का महत्व, स... [पूरी पोस्ट]
writer श्रीकांत पाराशर
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[10 Oct 2008 03:41 AM]

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