एक पेंच

चलते-चलते उसकी मम्मी कहती थी अक्सर कि उसका बेटा किसी खिलौने से नहीं खेलता है ज्यादा समय बस उसके लिए क्षणिक आकर्षण भर होता है वह खिलौना फिर ना जाने क्यूं उस खिलौने के पुर्जे-पुर्जे अलग करने में उसका मन ज्यादा लगता है और मैं कहता हूं कि शायद उसका बेटा ना जाने क्... [पूरी पोस्ट]
writer राहुल सि‍द्धार्थ
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[09 Nov 2008 12:51 PM]

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