ग़ज़ल

जज़्बात-दिल से तमन्ना - ए - सरफरोशी का सैलाब चाहिए फिर ज़रूरत है वतन को इन्कलाब चाहिए आज खादी में छुपे हैं मुल्क के दुश्मन यहाँ अब ये सूरत हमें सब बेनकाब चाहिए हो गई गन्दी सियासत मुल्क की ये देखिये अब तो मुकम्मल शख्स का ही इन्तखाब चाहिए चंद गद्दारों के सबब तीरगी में... [पूरी पोस्ट]
writer अखिलेश सोनी

ग़ज़ल

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[22 Dec 2009 06:28 AM]

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