अगर तू... तू ना होता।
अगर तू, तू ना होता , महकता कारवां-ए-सफ़र ना होता । सम्चित्त मज़ारों में, रंगो का दखल ना होता , रोज़मर्रा ज़िंदगी में, एक दूसरा अमल ना होता , अगर तू, तू ना होता । महकते कारवां में अब दर्द का बसेरा है , खिलखिलाती धूप में कुछ शाम का अँधेरा है । यूं तो फिर...
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Atul Mongia
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[05 Apr 2008 07:11 AM]



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