'एक' सुख
है हाथ मेरे कुछ नही , मैं अकेला, बेजान, निस्वप्न । दुखों की पोटली ढोता , एक मैं । है अन्दर सब खाली , बाहर निरी कंगाली । तो आज अचानक , यह सुख कहाँ से आया । एक अकेला मैं, कबसे रहा अकेला , ना समाज का हुआ, ना प्यार का, ना किसी काम का । परजीवी का जीवन मेर...
[पूरी पोस्ट]
Atul Mongia
13
0
0
0
0
[05 Apr 2008 06:50 AM]



Shuffle








