वो नज़र नज़र से गले मिली तो बुझे चराग़ भी जल गए
सुरपेटी पर पहली बार तशरीफ़ ला रहे हैं उस्ताद मेहंदी हसन साहब. न जाने कितनी बार लिख चुका हूँ कि ग़ज़ल की दुनिया का ये अज़ीम गुलूकार शायरी की आन रखने के लिये ताज़िन्दगी अपने आप को झोंकता रहा है. जब ख़ाँ साहब गा रहे होते हैं तब मूसीक़ी और शायरी को जैसे मनचाही...
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संजय पटेल...
ग़ज़ल
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[03 Oct 2008 11:51 AM]



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