गांव-शहर पर लम््बी टिप््पणी

बकौल बेद मैंने यह टिप््पणी 'मोहल््ला' में लिखी। 'गांव रहने लायक हैं मगर किसके लिए...' पर अपनी राय दी। अब आप बताएं कि मुफ््त में इतनी लम््बी राय देना क््या जायज है। शहर में हर गली में ठगी और लूट है। दूकानदार और लोग बेतरह लूटते हैं, जानते हैं कि फिर भेंट नहीं ह... [पूरी पोस्ट]
writer वेद रत्न शुक्ल
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[25 Dec 2008 01:20 AM]

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