परवीन शाकिर की एक ग़ज़ल
बारिश हुई तो फूलों के तन चाक1 हो गये मौसम के हाथ भीग के सफ़्फ़ाक2 हो गये बादल को क्या ख़बर है कि बारिश की चाह में कितने बलन्द-ओ-बाला शजर ख़ाक हो गये जुगनू को दिन के वक़्त परखने की ज़िद करें बच्चे हमारे अहद के चालाक हो गये लहरा रही है बर्फ़ की चादर हट...
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Geetashree
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[13 Dec 2008 02:38 AM]



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