गंगा बहती हो क्यों

नदिया बहती जाए रचना: पंडित नरेंद्र शर्मा स्वर: भूपेन हजारिका विस्तार है अपार प्रजा दोनों पार करे हाहाकार निःशब्द सदा ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों नैतिकता नष्ट हुयी, मानवता भ्रष्ट हुयी निर्लज्ज भाव से बहती हो क्यों इतिहास की पुकार करे हुंकार ओ गंगा की धार निर्बल ज... [पूरी पोस्ट]
writer Geetashree
views
9
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[13 Aug 2008 01:00 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix