नदिया किनारे हे राई आई कंगना
सत्तर के दशक में अभिमान बनी थी. मजरुह साहब ने लिखा और एसडी बर्मन ने सुर दिए. नदी फिर-फिर अमर हो गई और नदी के बहाने ये गीत. हे नदिया किनारे हे राई, आई कंगना ऐसे उलझ गए, अनाड़ी सजना नदिया किनारे ... काहे पनघट ऊपर, गई थी चलके अकेली मारे हँस हँस ताना, सार...
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Geetashree
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[17 Aug 2008 15:06 PM]



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