खंडहर होते सपने

ढ़पली पत्रकारिता की दहलीज़ पर जब कोई नौनिहाल जोश, जज्बे और उम्मीद के साथ कदम रखता है, तो शुरुआत मे उसे ये दुनिया हसीं लगती है, लेकिन समय बीतने के साथ हकीकते खुद सामने आ जाती है, उसके सपने किसी रेत के महल की तरह भरभरा कर गिर जाते है बडे लगन और त्याग से पढाय... [पूरी पोस्ट]
writer अनुराग मिश्र
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[29 Nov 2007 05:30 AM]

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