खुला आकाश

ढ़पली पंखों पे अपने क्यों तुम्हें विश्वास ही नही आकाश का तुमको जरा अहसास ही नहीं दीवारों दर से भी न कहें किससे हम को हाल और कोई पास ही नहीनी जिंदगी की राह में हैं हर तरह के पेड़इसमें बबूल भी हैं अमलतास ही नहींअपने गमों के दौर की लम्बी है दास्तानअपनी खुशी क... [पूरी पोस्ट]
writer अनुराग मिश्र
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[25 Jul 2008 06:08 AM]

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