मेरी चार लाइनें( पूरी रचना आनी अभी बाकी है।)
आज तेरे सामने, जो मिट्टी में लोट रहा। वही कृष्ण कल,पूतना का काल हो सकता है। न तेरा हरा है, न मेरा केसरिया होगा। लहू का रंग तो, केवल लाल हो सकता है।...
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प्रवीण शाह
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[16 Aug 2009 11:43 AM]



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