चार और लाइनें...

सुनिये मेरी भी.... मजबूती से थमा गिलास, फिसल कर बिखर गया, ऐसा तो सिर्फ उन्हीं, निगाहों का कमाल हो सकता है। तूने गौर से देखा था? मेरे मेहबूब के माथे को.. सिंदूर तो नहीं ही होगा , गुलाल हो सकता है।... [पूरी पोस्ट]
writer प्रवीण शाह
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[30 Aug 2009 10:20 AM]

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