आज गोधिली वेला में...
आज गोधिली वेला में छत से देखा, बुरखा पहने, लड़की? औरत? बुढिया? पता नहीं, कोई सस्त्री, जो अहसास दिला गई, उसमे और कफ़न में लिपटे हुए लास में सिर्फ एक फ्रक हैं इसके आलावा, कोई अंतर नहीं जी रही तन लिए वह स्त्री, मन तो पिंजरे में बंध हैं, जिसकी कुंजी हमारे...
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"Azad Sikander"
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[31 Oct 2007 04:30 AM]



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