मेरी ज़िन्दगी
संजय माथुर ज़िन्दगी से हार के जो पूछा मैंने - तू तो कहती है तू है मेरी , फिर क्यों बनी है बैरन मेरी ? मैं चाहता हूँ हँसना , खुश रहना , फिर क्यों रुलाती है मुझे बैरी ? मेरी ज़िन्दगी हँसी और बोली , ज़िन्दगी हैं आपकी , बांदी नहीं हम ! हमसे रूठ के हँसेंग...
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kavitaprayas
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[07 Jan 2009 18:48 PM]



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