कल क्या होगा
लक्ष्मीनारायण गुप्त आज प्रिये मधु पी लो मन भर देर करो ना पी लो सत्वर आज बजा लो मन की वीणा आज प्यार तुम कर लो मन भर किसे पता है कल क्या होगा आज खेल लो जितना चाहो खेल खेल में मन बहला लो पुष्पों से तुम केश सजा लो प्रियतम को तुम गले लगा लो किसे पता है कल...
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kavitaprayas
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[07 Jan 2009 16:52 PM]



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