नववर्ष फिर आया है
डा. रमा द्विवेदी एक वर्ष भी बीत गया, नया वर्ष फिर आया है, कितना खोया,कितना पाया? गणित नहीं लग पाया है। कितने पल हमसे रूठ गए, कितनी विभूतियाँ खोई हैं, कितने शूल चुभे अन्तस में, कितनी मालाएँ पिरोई हैं, मंदिर में कुछ पल बीत गए, श्मशान से कभी बुलावा है।...
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kavitaprayas
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[09 Jan 2009 02:11 AM]



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