यूँ झुकना हमें भी गवारा नहीं है

my favorite contemporary poets मैत्रेयी अनुरूपा यूँ झुकना हमें भी गवारा नहीं है मगर हमने बोझा उतारा नहीं है कदम लड़खड़ाये जरा इसलिये भी कि बैसाखियों का सहा रा नहीं है नहीं तैरता कोई ताउम्र इसमें ये दरिया है जिसका किनारा नहीं है ये इक सुर्ख शै जिससे दामन बचाते ये दिल है हमारा अँगारा... [पूरी पोस्ट]
writer kavitaprayas
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[15 Jan 2009 19:08 PM]

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