बोलो कबीर !
एक अरसे से नहीं सुनी आवाज़ तुम्हारी आख़िर चुप क्यों हो कबीर... मंदिर के घड़ियालों और मुल्ला की अज़ानों के बीच कहाँ खो गई है आवाज़ तुम्हारी चुप क्यों हो कबीर... एक-दूसरे से लड़ बैठे हैं राम और रहीम जख़्मों के बीच सुबक रहा है एकेश्वर चुप क्यों हो कबीर....
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नीरज
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[29 Sep 2008 13:12 PM]



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