नदी
पुल से गुज़रते हुए अक्सर सोचता हूँ नदी के पास भी होती होंगी यादें अपनी यादों में सहेजती होगी हरे मैदानों का संग पनघट की अल्हड़ गाथाएँ कभी सुनाती होगी बैचेन किनारों को पत्थरों के शालिग्राम बनने की कथा जब कभी याद आते होंगे हमारे हाथों दिये ज़ख्म तो करा...
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नीरज
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[10 Apr 2009 11:50 AM]



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