मेघा रे ...
काली बदरिया से दो बोल जैसे घटाओं के पुष्पक विमान पर बैठकर धरती के अंगनारे में बूंदों की बारात आई हो... जैसे प्यासी धरती की तड़प ने महासागर की तलहटी को झकझोर दिया हो... जैसे बीजों के भीतर सो रहे अंकुरने वाले गीतों ने कोरस में मल्हार गाया हो... जैसे सू...
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ओम द्विवेदी
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[14 Aug 2008 15:43 PM]



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