एक कविता
जुकाम जुकाम जब अपने चरम पर होता है तो नहीं सुनाई पड़ती बम की आवाज़ कानों के भीतर सांय-सांय दौड़ता है बम का सन्नाटा किसी की मौत पर भी झनझना कर नहीं खड़े होते रोएँ सुंदर से सुंदर स्त्री देखकर नहीं होती प्यार करने की इच्छा काम करते हुए जब टपकती है नाक तो...
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ओम द्विवेदी
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[18 Aug 2008 15:32 PM]



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