रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की एक कविता
कलम, आज उनकी जय बोल जला अस्थियां बारी बारी छिटकाईं जिनने चिनगारी जो चढ़ गए पुण्य-वेदी पर लिए बिना गरदन का मोल कलम आज उनकी जय बोल जो अगणित लघु दीप हमारे तूफानों में एक किनारे जल-जलकर बुझ गए किसी दिन मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल कलम, आज उनकी जय बोल पीकर ज...
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ओम द्विवेदी
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[19 Aug 2008 16:07 PM]



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