सन्नाटे की डायरी

रेवा कई दिनों से आसपास सन्नाटा पसरा हुआ है। चारों ओर भीड़ है, शोर है, रिश्ते हैं, आदमी हैं, कुदरत है, लेकिन उनसे तादात्म्य बनाने वाला बोध शायद कहीं अनुपस्थित है। कोई भी दुर्घटना दिल को ऐसा नहीं हिलाती कि आंखों से आंसुओं के बादल झर पड़ें, कोई भी खुशी इतना न... [पूरी पोस्ट]
writer ओम द्विवेदी
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[01 Nov 2008 16:18 PM]

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