खुशबू
मेरे शब्दों की खुशबु में छुपी है दास्ताँ मेरी। या फ़िर जीवन की खुशबु से उभरे हैं यह शब्द सारे? यह शब्द और खुशबु हैं पास मेरे सदियों से, अंधेरे और उजाले की तरह, ख्वाबों और ख्यालों की तरह। कहते हैं खुशबुएँ किसी एक वादी में नहीं रहती। शायद सच ही कहते हैं...
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Piyush Aggarwal
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[18 Dec 2008 02:26 AM]



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