नारी-जीवनः एक लेखा जोखा

भगवान भरोसे वह सब जगह है फिर भी वह कहीं नहीं है। उसके बिना न सृष्टि बनती है न परिवार, न समाज, पर इन सब को बनाती वह स्वयं क्या बनती है और उसके हाथ क्या आता है यह कोई नहीं पूछता? उसका होना सबके होने की शर्त है, फिर भी उसके नहीं होने की फिक्र किसी को नहीं है। वह स्... [पूरी पोस्ट]
writer pratibha
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[01 Jul 2009 21:45 PM]

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