वो सुख तो कभी था ही नहीं,

भीगी गज़ल जिसकी तलाश मुझे भटकाती रही, चाह में खुद को जलाती रही वो सुख तो कभी था ही नहीं बेसबब उन पथरीली राहों पर चलकर खुद को ज़ख़्मी बनाती रही, कभी गिरती कभी सम्हल जाती सम्हल कर चलती तो कभी लड़खड़ाती लड़खड़ाते कदमो को देख लोग मुस्कराते कोई कहता शराबी तो कई पाग... [पूरी पोस्ट]
writer श्रद्धा जैन
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[27 Jul 2008 02:15 AM]

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