कभी
वक़्त करता कुछ दगा या, तुम दगा करते कभी साथ चलते और तो, हम भी बिछड़ जाते कभी आजकल रिश्तों में क्या है, लेने-देने के सिवा खाली हाथों को यहाँ, दो हाथ न मिलते कभी थक गये थे तुम जहाँ, वो आख़िरी था इम्तिहाँ दो कदम मंज़िल थी तेरी, काश तुम चलते कभी कुरबतें...
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श्रद्धा जैन
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[05 Oct 2008 00:08 AM]



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