तेरी याद में
गोपी कृष्ण सहाय चले गए तब ज्ञात हुआ , अपना खोना क्या होता है ! याद में तेरे साथी मेरे , घर आंगन भी रोता है !! वही आंगन ढ़ूढते थे तुम , मै कहीँ छुप जाता था कई सवाल पूछोगे ये , सोच नजर चुराता था !! बड़े जटिल लगते थे , प्रश्न तेरे सीधे सादे !लौट के ना आ...
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प्रभात रंजन
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[26 May 2008 12:11 PM]



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