दि थर्ड वर्ल्ड

हलफ़नामा गुलज़ार साहब की नज़्म (आज किताबों की धुल पोंछते हुए करीब एक दशक से ज्यादा पुरानी एक मैगजीन में गुलज़ार साहब की ये नज़्म मिल गई । तब नई थी और मौज़ूं भी... । पढ़ने में आज भी अच्छी लगी तो ले आया ) जिस बस्ती में आग लगी थी कल की रात उस बस्ती में मेरा कोई... [पूरी पोस्ट]
writer प्रभात रंजन
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[22 Jun 2008 15:04 PM]

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