तमाशा-ए -अहल-ए-करम देखते हैं

हलफ़नामा प्रभात रंजन कल की बात है । घर से अॉफिस के दरम्यान मेरे साथ एक हादसा हुआ । हादसा कुछ यूं नहीं कि सिर-पैर- हाथ टूट जाएं । हुआ कुछ यूं कि दिमाग कि नसें झनझना गईं। मैं बस में चलता हूं और दिल्ली की बसों में आए दिन किसी न किसी ऐसी चीज का सामना होता ही रहता... [पूरी पोस्ट]
writer प्रभात रंजन
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[23 Jul 2008 08:19 AM]

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