मैं दृष्टा हूँ
देखता हूँ गगन, सुमन और समुंदर की तरुणाई को,प्रति पल धीमी होती हुई इस समय की अरुणाई को।दु:ख के रक्त कणों से लतपथ जीवन के अवसाद को,या सुख के प्यालों से छके हुए मन के अंतर्नाद को।शीत उष्ण और वर्षा पतझड़ ऋतुएं आती जाती हैं,इस शरीर और मन के द्वारों पर दस्त...
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sanjeev persai
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[07 Sep 2008 06:59 AM]



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