कभी तो............ग़ज़ल
कभी तो दर्ज होगी जुर्म की तहरीर थानों में. कभी तो रौशनी होगी हमारे भी मकानों में. कभी तो नाप लेंगे दूरियाँ ये आसमानों की, परिन्दों का यकीं क़ायम तो रहने दो उड़ानों में. अजब हैं माइने इस दौर की गूँगी तरक्की के, मशीनी लोग ढाले जा रहे हैं कारख़ानों में....
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संजीव गौतम
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[10 May 2009 03:00 AM]



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