बड़ा बेदर्द पेशा है, इसमें कोई साझीदार नहीं!
वो खबर आंखों के आगे से किसी भी आम खबर की तरह गुजर जाती...लेकिन ऐसा नहीं था...जिंदगी के चंद बरस साथ काम किया था...एक ही दफ्तर में आना जाना...चंद डेस्कों का फासला...लेकिन ये फासला अक्सर मिट जाया करता...जब हम किसी बात पर मजाक करते...गपियाते...हंसते-बोलत...
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मिहिर
समाज
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[31 Oct 2008 17:31 PM]



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