कवि की आंखें
कवि की बेधक आंखें सात परदों के भीतर का सच देख सकती हैं . कवि की जुबान पर बसती है सच्चाई . कवि के भीतर झंकृत होता है जन-गण का मन . झलकता है लोक का आलोक और उसके दुख का धूसर रंग . उसकी वाणी कहती है धरती की पीड़ा,बेजुबानों के दुख – गूंगी हो चुकी [.....
[पूरी पोस्ट]
chaupatswami
5
0
0
0
0
[13 Nov 2007 03:17 AM]



Shuffle








