साहित्यानुरागी

समकाल चौपटस्वामी की चौपट कविता साहित्यानुरागी बाबा छाप या एक-सौ बीस डालकर देसी पत्ता चुभलाते-चबाते हुए – कचर-कचर पीक इतै-उतै थूकते बगराते हुए – पचर-पचर चेलों की जमात से लगातार बोलते-बतियाते हुए – कचर-पचर वे सुन रहे हैं कवि की कविता अंगुली... [पूरी पोस्ट]
writer chaupatswami
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[04 Jul 2008 02:44 AM]

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