उसकी पहुंच...
सोचती हूं हर पल, दर्द के गहराते पैमाने, इतने गहरे कि, मेरी आवाजों की कोठरियां गूंजने लगे, और हंसी का- एक सिरा तक, उसे छू न सके। मैं सोचती हूं कि , फिर वो - कैसे पहुंचता है, वहां तक??...
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तरूश्री शर्मा
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[04 May 2008 11:58 AM]



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