लटके हैं अरमां उल्टे
जुड़ने को था जो, अभी बिखर गया, बिना कहे... सफर बदल गया। ख्वाब था एक, जुड़ा सा दिखता था, पास आते ही, मकड़जाल पर जमी, बारिश की बूंदों सा.. कतरा कतरा ढुलक गया। ताउम्र सोचने की ख्वाहिश थी, उससे मिलने की एक गुजारिश थी, वक्त से वफाई ना हुई, घरौंदों सा बिगड...
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तरूश्री शर्मा
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[26 Aug 2008 06:13 AM]



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