सवालों के ढेर से....धुंए के छल्ले
रातें हर रोज खाली खाली सी रहने लगी थीं.... जैसे तारे आसमान से अब चिपकते ही ना हों और चांद की डोरी आकाश से लटकती ही नहीं थी। रात का सन्नाटा जैसे होता ही नहीं था और अंधेरे की कालिख पसरती ही नहीं थी। दिन जैसे दिन की तरह नहीं होते थे.... सूरज का रथ जैसे...
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तरूश्री शर्मा
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[28 Aug 2008 04:42 AM]



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