अब बुझा दो ये सिसकती हुई यादों के चिराग, इनसे कब हिज्र की रातों में उजाला होगा??

मैनें आहुति बनकर देखा.. भारतीय लोकतंत्र का एक पर्व और बीत गया। अब तो रोजमर्रा की बात हो गई है। बल्कि अब अगर सुबह का अखबार खून के छींटों से तर न आए, तो लगता है अभी रात ही चल रही है, अभी ख्वाब टूटा नही है, अभी सुबह ठीक से हुई नही है। सही ही है। आम आदमी की जेब में पैसे न हों त... [पूरी पोस्ट]
writer कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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[04 Dec 2008 07:13 AM]

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