वो भी एक वक्त था.....
मैंने कहा था ना कि मैं तुम्हारे ख्वाबों में आऊँगी, इसी कारण सजने को- कल बाग में गई थी मैं, मेंहदी लाने। निगोड़े काँटे, शायद दिल नहीं है उनमें, चुभ कर मुझमें, मुझे रोक रहे थे। लेकिन तुमसे वादा किया था ना मैंने, इसलिए बिना मेंहदी लिए मैं लौटती कैसे। फिर...
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गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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[20 Feb 2009 07:48 AM]



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