ऐसा तो नहीं होता है???

तेरे नाम........यही तो है। जानवर*~*~*~*~**~*~*~* धुंआ बना कर फिज़ा में उड़ा दिया मुझको, मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझको. खड़ा हुं आज भी रोटी के चार टुकड़ों के लिये, सवाल यह है किताबों ने क्या दिया मुझको??? सफैद रंग कि चादर लपैट कर मुझ पर, बिजुका की तरह खैत पर किस ने सजा दिया... [पूरी पोस्ट]
writer गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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[17 Mar 2009 01:32 AM]

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