जब भी तुम्हारी याद.......
जानवर~*~*~*~*~*~ ऎ बेवफा जिन्दगी क्यों मुझसे दगा करती हो? जो भी बना अपना, उसे पराया करती हो, चाहा जो मुस्कुराना तो आँखे भीगोती हो. अब यहाँ कोई नहीं, क्यों इन्तजार करवाती हो? कौन है यहाँ जो सुलझाये उलझी जुल्फ़ें, क्यों टूटे दिलों को युं जलाती हो? अगर ग...
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गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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[30 Mar 2009 07:26 AM]



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